Sunday, September 20, 2009

तंज़


अभी भी सामने उसके छिटक जाती है नजर

न आया अब भी मुझे उससे बोलने का हुनर ।


अभी भी राज ऐ दिल उसको बता नही पाया

कोई मजाक नही राज खोलने का हुनर ।


सबको बख्शी है खुदा तूने आदमी की परख

मुझे भी कर अता आँखों से तोलने का हुनर ।


तुम अपने याद के नक्शे मिटा न पाओगे

मैं जानता हूँ लफ्ज ओ वक्त घोलने का हुनर ।


कि जिस तरह से सिखाई थी सलीका ऐ वफ़ा

उसी तरह से सिखाना था भूलने का हुनर .


3 comments:

p guru said...

great.................

awanish dubey said...

'अभी भी सामने उसके छिटक जाती है नजर

न आया अब भी मुझे उससे बोलने का हुनर' ।
wakai iss line ko padh ke kuch-kuch hota hai!!!!!

pankh said...

वाह ज़नाब वाह !!

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