Wednesday, September 23, 2009

फ़िर वही तलाश ..............


तेरी बातें,तेरी यादें, तेरे ख़त,तेरी तलाश

मेरे घर के साथ ही सुपुर्द ऐ आतिश हो गईं ।


दिल बिका मेरा फकत कुछ कौडियों के मोल से

फक्र करते थे बहुत, लो आजमाईश हो गयी ।


तब कहा करते थे उसकी आंखों मे है सादगी

अब कहा करते हो मेरे साथ साजिश हो गई ।


उनका था ये कौल तेरे सामने न आयेंगे

आज ये कैसे मगर उनकी नवाजिश हो गई ।


रो दिया था आस्मां भी सुन के मेरी दास्ताँ

जैसे ही मैं चुप हुआ वैसे ही बारिश हो गई ।




2 comments:

महफूज़ अली said...

ro diya tha asmaan bhi sun ke meri daastan.....wah! Satya......... bahut hi satya baat kahi .........

aise achcha likhte rehna........... yahi dua hai.....

adhura swapn said...

tab kaha karte the uski aankhon main hai sadgi...aab kaha karte hain ki mere sath sajish ho gayi.............

ye baat aapne bahut achi likhi hai......kamal ki poetry hamesha ki tarah..dhero subhkamnaye....

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