Wednesday, September 16, 2009

खुदकुशी

(चित्र गूगल से साभार )

मैं पहले बोलता था
अब पहरों सोचता हूँ ।

बहुत पढता था पहले
कि अब लिखने लगा हूँ ।

मैं हँसता भी बहुत था
पर अब चुप सी लगी है ।

मै पहले उड़ रहा था
पर अब पर ही नही है ।

जरा सी आग रहती थी
अब बस राख ही है ।

तब थोड़ा हौसला था
पर अब कुछ भी नही है ।

मुझे ये गम नही कि तुमने मुझे छोड़ दिया है ऐ दोस्त
गिला यह है तुमने कहीं का नही छोडा

3 comments:

अभिषेक ओझा said...

इतने बदलाव से तो यही निष्कर्ष निकलता है... सच में कहीं का नहीं छोडा !

Anonymous said...

aacha likha hai
sushma

kabir khan said...

bahut khub bhaiya,

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