Wednesday, September 9, 2009

बद बख्त


जिन्दगी, ख्वाहिशें, मुस्कराहट और तुम्हें

बहुत कुछ खो दिया है तलाश ऐ रोज़गार में।


बेखुदी और बेबसी और बेनियाज़ी के इतर

ये दाग ऐ सुर्ख कैसा है निगाहे ऐ यार मे ।


बैठें हैं गुल्शितां मे तेरी राह देखते

तुमने कहा था आओगे अगले बहार मे ।


तेरी नज़र की रौशनी है मेरा उजाला

जब ही तो मेरे पाँव बचे दस्त ऐ खार मे ।


कोई तो है जो करता है सिजदा तेरे लिए
तू भी तो ऐतबार ला परवरदिगार मे ।



बेनियाज़ी- neglect

दाग ऐ सुर्ख- a red spot

दस्त ऐ खार- काँटों का जंगल, a jungle full of thorns.

गुलिश्तां- lawn








1 comments:

नारदमुनि said...

narayan narayan

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