Tuesday, October 13, 2009

रात, चाँद और हम


तू मेरे गम में साथ चलता है

तू मेरी हर खुशी में ढलता है ।


दिल की नादानियाँ तो जायज हैं

जेहन भी चाँद को मचलता है ।


तुझको सुनके ही जान आती है

तुझको सुनके ही दम निकलता है ।


कौन सी बात की कसम दूँ तुझे

तू तो हर बात पे बदलता है ।


आँखें पढ़ लेती हैं तेरे दिल को

जब दुप्पट्टे को तू मसलता है .



(चित्र -गूगल से साभार)

2 comments:

शरद कोकास said...

भई चित्र बढ़िया है और कविता उसे पूरा करती है ।

Prabudha said...

kaun si baat ki kasam doon tujhe... tu to HAR baat pe badalta hai..

waah bhai.. badhiya... humesha ki tarah... sadhuvaad!

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