Friday, October 9, 2009

नसीहत



कुछ इस तरह से दफ़न, हम तुम्हारी याद करें


मकान ख़ुद को करें और तुम्हें बुनियाद करें ।



अच्छाइयाँ हर वक्त की अच्छी नहीं ए दोस्त


चलो कि इश्क मे खुद को जरा बर्बाद करें।



तेरा खुदा, तेरा मुंशिफ और तू यक सा


जेहन में कशमकश , अब किसे फरियाद करें।



बदी नेकी की बहस अपनी जगह चलने दें


एक बुलबुल को पिंजरें से हम आजाद करें ।



ये और बात की तुझसे ही सारे दर्द मिलें


मगर मजाल नहीं तुझको हम नाशाद करें

2 comments:

नारदमुनि said...

khub likha.narayan narayan

manish said...

bhaut acha hai
mujhe kavita or gazal ka shok hai par thoda urduhe aata hai 'munsif' ka matlab jara bata dey mujhe aapki last line ......magar majaal nahi tujhko hum nasaad kare .....jaise apni jindagi ki kuch yaadei lagti hai...aapke dwara mein atit ko yaad kar raha ho......or shabad nahi hai mer pass.....aapki is rachana k liye...bhaut acha

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