Tuesday, September 4, 2012

एक दलित कविता

शाख से टूटे तो फिर मर जाएँगे पत्ते
फूलों की नुमाईश मे बिखर आएंगे पत्ते 

मालिक ने भी फूलों को ही तो सर पे चढ़ाया
है मतलबी माली तो किधर जाएँगे पत्ते |

 फूलों के बेरुखी के हश्र का सवाल था
 मेरा था ये जवाब  कि झर  जाएँगे पत्ते 

बारिश ये रहमतों  की तो बस एक फ़रेब है 
तुम देखना ओसों से सँवर जाएँगे पत्ते 

तुमको है ये गुमाँ कि शहर दिल्ली दूर है
 मुझको है  ये यकीन कि शहर जाएँगे पत्ते

10 comments:

दिगम्बर नासवा said...

फूलों के बेरुखी के हश्र का सवाल था
मेरा था ये जवाब कि झर जाएँगे पत्ते ..

जबरदस्त शेर ... पूरी गज़ल धमाल मचा रही है ...

Anonymous said...

"mujhko hai yakeen ki shehar jayengay pattey"
kya khub bhaut acha.......

Anonymous said...

bahut khoob sir.. bahut khoob ...
-Mayank Goswami

Unknown said...

Kya baat hai Sir, aaj kaal aap busy hai kya ? Kuch naya nahi mila padne ko bahut dino seee

vibha rani Shrivastava said...

मंगलवार 03/12/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
आप भी एक नज़र देखें
धन्यवाद .... आभार ....

Asha Saxena said...

बहुत बहुत बहुत सुंदर रचना है |
मेरी हार्दिक बधाई स्वीकार करें |

Asha Saxena said...

बस एक बात सोच में डाल रही है कि कविता कब से दलित होने लगी |
आशा

कालीपद प्रसाद said...

मुझे भी समझ नहीं आता -दलित कविता क्या है ? दलित साहित्य क्या है ?कविता कविता है साहित्य साहित्य है / रचना बढ़िया है !
नई पोस्ट वो दूल्हा....
नई पोस्ट हँस-हाइगा

Mukesh Kumar Sinha said...

बहुत गरीब कविता :)

sunita agarwal said...

waahh lajawab ... ek ek sher umda ..ek ko achha kahu to dusre ki touheen .. badhayi

Post a Comment