Sunday, May 30, 2010

WHAT'S IN THY NAME



तुम्हारे ज़ाए ने तुम्हे माँ कहा है


आज तुमने पूर्णत्व को छुआ है .


अपने प्रारंभ में तुम किसी के घर की लक्ष्मी हुई.


समझने की उम्र में खुद को फलां की बेटी जाना.


भईया की बहन होने में भी कोई षड्यंत्र नहीं था


सुरक्षा ही थी कदाचित .


स्कूलों में भी हाजिरी के "यस सर" तक सीमित थी तुम .


शीशे में खुद को पहचानने के दिनों में


शोहदों ने कुछ नाम भी दिए होंगे तुम्हे .


(मैंने भी एक नाम दिया था याद है तुमको)


फिर शहनाईयों के शोर ने मोहलत न दी होगी


बहू, दुल्हन या फिर भाभी की आदी हो गयी होगी ।


मगर तुम फिर भी खुश हो क्योंकि,


तुम्हारे ज़ाए ने तुम्हे माँ कहा है
आज तुमने पूर्णत्व को छुआ है.


सुनो मेरा कहा मानो


कि अब तो खुद को पहचानो


और उस दिन से हिरांसा हो


वो जिस दिन पूछ बैठेगा


तुम्हारा नाम क्या है माँ?









12 comments:

रवि कुमार, रावतभाटा said...

ओहो...क्या लिख गये हैं आप...
आखिरी पंक्तियों ने शरीर में झुरझुरी पैदा कर दी...

प्रचलन से हटके जज़्बातों और स्त्री की अपनी पहचान को टटोलते शब्द...

तुम्हारा नाम क्या है...माँ...?

dimple said...

सुनो मेरा कहा मानो

कि अब तो खुद को पहचानो

और उस दिन से हिरांसा हो

वो जिस दिन पूछ बैठेगा

तुम्हारा नाम क्या है माँ

आखरी पंकतिया पंच lines है.

p guru said...

आखिरी कि पंक्तियाँ शरीर में झुरझुरी ही नहीं ,दिमाग में खलबली भी मचाती है.
और
और काफी कुछ सोचने पे मजबूर करती है...
स्त्री -पछ का एक अदृश्य पहलु प्रकाशित करने के लिए धन्यवाद...!!

AWANISH P DUBEY

दिगम्बर नासवा said...

सुनो मेरा कहा मानो
कि अब तो खुद को पहचानो
और उस दिन से हिरांसा हो
वो जिस दिन पूछ बैठेगा
तुम्हारा नाम क्या है माँ?..

स्त्री स्त्री न हो कर कुछ और भी है ... इस सत्य को स्त्री जानती है .. तभी तो धैर्य रखती है पूर्ण होने तक ... माँ होने तक .. बहुत अच्छा लिखा है ..

Vinay Prajapati 'Nazar' said...

ख़्यालों और ख़ाबोम की महक छुपी है!

सुलभ § Sulabh said...

अच्छा लगा इस रचना से रु-ब-रु हो हर.
-
और ये सपने अभिशप्त क्यूँ है भाई? (शायद ऐसा ही होता है)

दिलीप said...

oho bahut umda...bada dilchhuaak tha...

डा० अमर कुमार said...


एक सत्य को बहुत खूबसूरती से उकेरा है,
पूर्णत्व की प्रतीक स्त्री ताउम्र अनाम क्यों रह जाती है ?
उसे अपनी पहचान के लिये दूसरों के नाम से जुड़ते और टूटते रहना होता है ।
ख़्यालों को आँदोलित करने की सीमा तक खूबसूरत चित्रण !

vinay said...

जैसे बहुत से लोग ने कहा,इस काव्य की आखिरी पंक्ति दिल को छू गयी
पूछेगा तेरा नाम क्या है माँ

Mohan said...

Aaj is baat ka ehsas ho raha hai ke Tumhare ander kafi kuch jwaar/bhata hai jo ab bahar nikalne ko betab ho raha hai.

Main bhi sabse sahmat hoo ki "aakiri pankti dil ko choo gaye".

Sahi ja raste per rahe ho.

Tumhara ek Gumnam College Friend (bahut jaldi samne aaunga)

chitos,chittu said...

bhai der se aane ke liye maaffi cahta hun... bt ab time se aunga or contzz dunga...

bahut accha likha hai mere dost......

kabir khan said...

kya khub likha hai aapne,kya likhu mai mere paas alfaz nahi hai,

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