Monday, April 19, 2010

कहा सुनी

उस रात,

जब मैं तुम्हे देना चाहता था

तुम्हारे हिस्से कि रोटी

तुम्हारे हिस्से के पैरहन

तुम्हारे हिस्से का मकान ........

तुमने मुझे मार्क्सवादी कहा था

रोटी और बन्दूक की फिलासोफी से अपने पल्ले झाडे थे

और फकत अपने हिस्से का प्यार मांगा था

नासमझ वक्त का बेलगाम दरिया बह गया

तुम चली गयी तो समझौते आ गए

आज की रात

जब मैं तुम्हे नहीं दे सकता

तुम्हारे हिस्से की रोटी

तुम्हारे हिस्से का पैरहन

तुम्हारे हिस्से का मकान

और ना ही तुम्हारे हिस्से का प्यार

तुमने मुझे बुद्धिजीवी कहा है

5 comments:

रवि कुमार, रावतभाटा said...

बेहतरीन कविता...
गज़ब के अंतर्द्वंद को उकेरती है...

adhura swapn said...

bhayo ko aasani se wayakt karna koi aapse sikhe..bahut acha bhaiya....keep doing the good work...

दिगम्बर नासवा said...

लाजवाब .... वाद और सीधान्तों को मिश्रित कर के रची एक बेहतरीन रचना है ...
खुद की सोच ही दिशा निर्धारित करती है और जीवन ऐसी सोचों की शर्त पर चलता है ... गहरी प्रस्तुति ...

हरकीरत ' हीर' said...

मार्क्सवादी और बुद्धिजीवी की अच्छी परिभाषा दी है आपने ....
यह कविता कहा-सुनी से कहीं ऊपर है ....इसलिए शीर्षक कुछ और देते तो सार्थक होता .....!!

Anonymous said...

Loved the way you have defined Marxism , Wonderful simple yet very poignant style of writing. will go through all of your poems . Thanks for visitng my blog. it is a pleasure to read your work .

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