Thursday, May 8, 2014

कुल्फी & Cappuccino: एक सुखद बदलाव की लौ.....

आशीष चौधरी अपनी लेखकीय में ही कहते है कि कहानी कहने का अपना एक सलीका होता है और क्योंकि कहानी उनकी है इसलिये सलीके भी उनके होंगे ।

तो साहब ! एक बात कह दूँ, कि आपके कहानी कहने का सलीका पुरअसर है। यह आपके कहानी सुनाने का तरीका ही है जो किसी भी तीसरे लड़के की कहानी को इतना रोमांचक इतना लयबद्ध और इतना नया बनाये रखता है ।
समय के अनुरुप ही पाठक भी बदलें हैं और लोकप्रिय कहानियों की तरफ झुकाव भी सहज ही देखने को मिल रहा है । अपनी जबान, जो हम-आप रोज बोलते सुनते है वो हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी का सुविधानुसार मिश्रण ही तो है । इसलिये यदि आपकी भाषा मे कोई किताब आपको पढ़ने को मिले तो कोई आश्चर्य नहीं कि यह अपनी पैठ लोगो के बीच आसानी से बना ले।

 कुल्फी & Cappuccino, आशीष चौधरी के ऐसे ही प्रयोग का नाम है। प्रयोग इसलिये भी कि इनका लेखन, शैली और भाषा तीनों प्रयोगात्मक है। बहुत बारीकी से आशीष, वहां, उसी भाषा का उपयोग करते है जो, यदि वह वहां होते तो खुद करते । उपन्यास संवादात्मक शैली में लिखा गया है इसलिये यह जरूरी था कि एक संवाद पढ़ने के बाद पाठक को दूसरा जवाब वही मिले जो उसने सोचा है और इस परीक्षा में लेखक खरा उतरता है। यही उसके लेखन की सफलता भी है ।  
लेखक ने यह पहले ही बता दिया है कहानी 2005 के आसपास की है। जब कोई कहानी एक समय विशेष की होती है परंतु उसे लिखा कुछ वक्त बाद जाता है तो इस बात का भी विशेष ख्याल रखना पड़ता है कि वक्ती चूक न हो। कुल्फी & Cappuccino लिखते समय आशीष चौधरी ने इस बात का विशेष ध्यान रखा है और इसके लिये वह अलहदा बधाई के पात्र हैं।
 
कहानी की बात करें तो यह रंगमंच पर युवा अनुराग की और नेपथ्य में प्रतीक और भूपी की कहानी है। कहानी इन तीनों के MBA की तैयारियों के गिर्द बुनी गई है और इस दौरान हुए कठिनाईयों, फाकामस्ती, प्रेम और तकरार को लेकर आगे बढती है। कोचिंग के दौरान छ: महीनों में हुए मानसिक बदलाव, चिंताये और उनकों काफूर करती दोस्तों की बैठकें, प्रेमियों की बातें, आपको, आपके कॉलेज के दिनों मे यकीनन ले जायेंगी। कहानी अपने अंजाम तक जाते जाते कई रोचक हालात लेकर चलती है। हालांकि जो रहस्य, लेखक लेकर चलता है वह थोड़ा और देर से खुलता तो उछल पड़ने वाली बात होती। कहानी का अंत थोड़ा पहले हो जाता है । फिर यह बात भी ज़ेर ए गौर है कि आशीष किताब खत्म करने से पहले कहते है कि यह कहानी का अंत नहीं है ।

कुल्फी & Cappuccino कम ओ बेश एक अलहदा और उम्दा प्रयास है । यह युवाओं की कहानी कहती है। यह पिता-पुत्र के सम्बन्धों को एक पुत्र के नजरिये से देखने का प्रयास करती है । यह प्रेम की पराकाष्ठा भी इंगित कर जाती है - चाहे एक वाक्य मे ही सही। यह युवाओं के मन में घुमड़ते अनेक सवालों के जवाब तलाशने का प्रयास भी है। संक्षेप यह कि अनुराग, प्रतीक और अंकुर कम ओ बेश ही सही, हर पाठक में हैं, मुझमें भी।

कुल्फी & Cappuccino आज के Y generation को खूब पसन्द आयेगी। यह उनकी कहानी कहती है ,उनको ध्यान मे रख कर लिखी गई है इसलिये यह सही मायने में उनकी किताब है। हाँ ! अगर बौद्धिकता का लबादा उतार दिया जाये तो यह नव क्लासिकी के कद्रदानों को भी पसन्द आयेगी, ऐसा मेरा ख्याल है ।

आशीष चौधरी से- अगली कहानी लिखना शुरु कर दें साहब। After all, it’s not ankur kind of request.

Y generation से- अच्छा पढने की आदत एक अच्छी आदत है ।

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