Wednesday, April 2, 2014

मसाला चाय: लाजवाब स्वाद



मसाला चाय: लाजवाब स्वाद
किताब: मसाला चाय
विधा: कहानी संग्रह
प्रकाशक: हिन्द युग्म
प्राप्ति स्थान: सभी ऑनलाईन स्टोर्स पर उप्लब्ध|



इक्कीसवीं सदी का दूसरा दशक अपनी किशोरावस्था में है और पहले दशक की कहानियां लिख रहा है। इस पहले दशक की कहानियां पूर्ववत कहानियों से इतर तो नहीं ही हो सकती। हां, परिवेश,समाज, नाम और विकास कुछ आगे बढ जाता है और यही कहानियां गढने का माध्यम और कारण बन जाती हैं। कहना न होगा कि भगवतीचरण वर्मा जिन बातों को टाईपराईटर के माध्यम से कह जाते थे आज वही कम्प्यूटर के माध्यम से कही जाती हैं।

 ‘मसाला चाय’ पर बात करने से पहले एक बात स्पष्ट कर दूं कि हिन्दी साहित्य मे लोकप्रिय साहित्य का पक्षधर रहा हूं और मेरे निजी विचार हैं कि वर्तमान परिस्थिति में हिन्दी साहित्य को पुनर्स्थापन एवं प्रतिस्पर्धी होने के लिये लोकप्रिय साहित्य की अविलम्ब दरकार है।

’मसाला चाय’, ‘दिव्य प्रकाश दुबे’ का दूसरा कथा संग्रह है। जिसमें कुल 11 कहानियां है। बालपन से लेकर किशोरावस्था तक के विभिन्न मनःस्थिति को दर्शाती यह कहानियां दरअस्ल सच्चाईयां हैं जिन्हें दिव्य प्रकाश दुबे ने उम्र के चढाव के अनुसार सजाया है।

पहली कहानी ‘ विद्या कसम’ बालपन की के मनोभाव को खूबसूरती से उकेरती है। बच्चों के चारित्रिक आचरण को समझने की कोशिश करती यह कहानी झूठ, डर, प्रेम, आदि कितनी ही भावनाओं को एक बच्चे की नजर से समझने का प्रयास है। इस कहानी को पढकर अनायास ही बशीर बद्र याद हो आते हैं:
‘उड़ने दो परिन्दों को अभी शोख हवा में
फिर लौट के बचपन के जमाने नहीं आते’।

दूसरी कहानीं ‘जीवनसाथी.कॉम’ प्रेम विच्छेद से उबर रहे एक युवक की कहानी है जिस पर घर से शादी करने का दबाव है और इसी कारण वह मैट्रिमोनियल साईट्स की शरण मे जाता है । इस कहानी के बारे मे बस इतना ही कहूंगा कि यह आपको  ओ. हेनरी की कहानियों की याद दिला देगी। कहानी हो समाप्त करते हुए आप लेखक को ‘वाह कहे बिना रह नहीं पायेंगे ।

‘बेड़ टी’ हठात ही बेरोजगार हो गये एक कॉरपोरेट यूथ की कहानी है जिसे अपने आने वाले कल की चिंता भी करनी है और अपनी लिव इन पार्टनर और उसके पिता दोनों को संतुष्ट करना है। इस साहसिक विषय पर (कम अज कम मेरे लिये तो साहसिक ही है) सफलतापूर्वक लिखने का दुस्साहस करने के लिये दिव्य प्रकाश बधाई के पात्र हैं।

वैसे तो सभी की सभी कहानियां अपना अलग कलेवर लिये हुए हैं परंतु यदि मेरी पसन्द ही सर्वमान्य हो तो इस संग़ह की सबसे अच्छी कहानी ‘KEEP QUITE’ है। बाल्यावस्था से किशोरावस्था की तरफ जा रहे बच्चों मे हो रहे मानसिक बदलाव तथा उसपर उचित मार्गदर्शन के अभाव मे होने वाले दुष्परिणाम को जितनी सरलता और जीवंतता से लेखक ने प्रस्तुत किया है वह बिरले ही देखने को मिलता है।
इस कहानी के अस्वाभाविक अंत ने मुझे परेशान कर दिया:
’मै तो समझा था भर चुके सब ज़ख्म
दाग़ शायद कोई कोई है अभी’
खैर, इस कहानी लिये ‘दिव्य प्रकाश’ को एक अलहदा बधाई बनती है।

पूरे कथा संग्रह से गुजरते हुए एक बात पर नज़र जाती है कि कहानी के होने और लिखे जाने में जो समयांतर है वह कहीं कही परिलक्षित होता है। मगर वह कथा की मूल विषय वस्तु को प्रभावित नहीं करता।

अंत में, इस कथा संग्रह की सबसे सकारात्मक बात पर अगर गौर न करूं तो यह बतकही अधूरी रह जाएगी।‘इसकी छपाई’। जी हां... कम अज कम मैनें तो पहली बार यह सुखद पहलू देखा की हिन्दी कथा संग्रह में भी अंग्रेजी मे कहे गये वाक्य अंग्रेजी मे ही छपे हैं वरना तो हिन्दी उपन्यास मे देवनागरी लिपी मे अंग्रेजी पढना दुष्कर होता है। इस नये चलन के लिये समग्र टीम को बधाई।
मसाला चाय पी कर देखिये। कायल हो जायेंगे।

सलाम,
सत्य व्यास


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