Wednesday, March 19, 2014

भले दिनों की बात थी......


पुस्तक समीक्षा
भले दिनों की बात थी...
नाम: भले दिनों की बात थी...
विधा: उपन्यास
उपन्यासकार: विमल चन्द्र पांडॆ
प्रकाशक: आधार प्रकाशन

हर्फ ए ताजा की तरह किस्सा ए पारीना कहूं
कल की तारीख को मैं आज का आइना कहूं।

‘ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार’ से सम्मानित विमलचन्द्र पांडे’ की यूं तो ये चौथी किताब है परंतु ‘भले दिनों की बात थी’, विमल चन्द्र पांडॆ का पहला उपन्यास है । उपन्यास का विन्यास, कथा कहानियों से इतर होता है और इसको उपन्यासकार ने बखूबी पहचाना है और उसी अनुरूप विन्यास दिया है।

कथा की बात करें तो संक्षेप में यह चार दोस्तों की कहानी है जिसका मुख्य पात्र ‘रिंकू’ यूं तो मुसलमान है परंतु पढाई के लिये वह बनारस की एक रेलवे कॉलोनी मे रहता है और उसे उसके पुकार के नाम ‘रिंकु’ के कारण लोग उसे हिन्दू ही समझते है। इसी मुहल्ले मे उसे एक लडकी ‘सविता’ से किशोरवय प्रेम होता है। यह उपन्यास इसी प्रेम की परिणति के अधूरे प्रयासों, कयासों और साहसों की कहानी है। यह उपन्यास रिंकु के किशोर से युवक और अधीर से गम्भीर बनने की कहानी है। यह उपन्यास दोस्ती की कहानी बयां करती है । यह उपन्यास प्रेम के आयाम दर्शाती है। यह उपन्यास सामाजिक ताने बाने को समझने का प्रयास करती है ।

उपन्यास ‘भले दिनों की बात थी’ की मूल कथा 2003 से 2006 तक की कहानी कहती है और उपसंहार 2016 की । कस्बाई या यूं कहें मोहल्ले का जितना सजीव चित्रण ‘विमलचन्द्र पांडे’ ने किया है, हालिया दिनों मे बिरले ही देखने को मिला है। भविष्य के लिये चिंतित युवा हों या बेटी के लिये चितित मां । धर्म का सवाल हो या फिर मुहल्ले का बवाल। दोस्तों की बैठकबाजियां हों या प्रेमियों की कारसाजियां, लेखक ने अनिरिक्त प्रयास से ही इसे शब्दों मे ढाल दिया है। चित्रण भी ऐसा कि चरित्र ही नहीं बल्कि माहौल भी आंखों के सामने घूमने लगता है। एक बानगी देखें:

“सविता जैसे ही कॉलोनी के मोड़ पर मुड़ी, उसे सामने से आता रिंकू दिखाई दिया जिसके होठों पर मुस्कान और मन मे उथल पुथल थी / वह अपने आप को संयत कर पीछे पीछे चल पड़ी”।

‘भले दिनों की बात थी’ को किसी एक कथाविध मे नही रखा जा सकता। कहीं कहीं यह आपको प्रेम कहानी लगती है तो कहीं यह सामाजिक उधेड़बुन की व्यथा सुनाती है। कहीं यदि यह आपको मित्र- गाथा लगती है तो अचानक ही किसी रोमांचक उपन्यास की तरह मुड़ जाती है।

‘विमलचन्द्र पांडे’ ने कस्बाई और भाषाई दोनों लिहाजों से बनारस को न सिर्फ जिया है बल्कि उसे आत्मसात भी किया है। जागरण का वर्णन, मित्रों का अंग्रेजी शिक्षण या फिर प्रेमियों के पलायन की योजनाओं का विवरण, आपको कस्बाई भाषा की छौंक जरूर मिलेगी और यही इस उपन्यास की यू,एस.पी भी है। 

‘पहले जानों. तब छरियाओ’।

‘मारब सारे चिंगुर जइबे।

‘तुम डॉक्टर से कैसे बात करते हो बे ? तुम्हारा अंगरेजिया अब्बो वैसा ही है’।

भाषा के भदेसपन मे लपेटते हुए उपन्यास के चरित्र को कब आप अंगीकार कर लेते है,पता ही नही चलता। आप पात्रों के साथ खुद को जोड़ ही नही लेते अपितु खुद उसकी जगह ले लेते है। यही उपन्यासकार के रूप मे विमल की सफलता है।

यह उपन्यास मशहूर शायर डॉ अहमद फ़राज़ मरहूम को समर्पित किया गया है । मगर यह समर्पण सायास ही है । अक्सर उन्हीं के शेरों के साथ प्रारम्भ होने वाले अध्यायों का निहितार्थ आगे मिलता जाता है और आप को शेर के कहे जाने का अर्थ समझ आता है।

अंत मे.... इस उपन्यास की सफलता की कामना करता हूं और विमल चन्द्र पांडे को बधाई देते हुए डॉ अहमद फ़राज़ मरहूम को ही दोहराना चाहूंगा:

जिसके हिज़्रां मे किताबों पे किताबें लिख दी
उसपे गर हाल हमारा नहीं खुलता, न खुले।

सलाम : सत्य व्यास

2 comments:

Digamber Naswa said...

अच्छी समीक्षा ... पुस्तक प्रभावी होगी ऐसा मुझे विशवास हो रहा है ...

Seetesh Kumar said...

Bahut khubbbb vyass G...

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