Friday, February 28, 2014

1984




 भाग 4 
31 अक्तूवर 1984
माहौल शाम से बिगडना शुरु हुआ। रेडियो और कुछ धनाढ्यों के घर टीवी पर तो यह समाचार दोपहर से ही प्रसारित  होने लगा कि प्रधानमंत्री जी की हत्या उन्ही के दो ‘सीख’ बॉडीगार्डों ने कर दी। बार बार लगातार इस ‘सीख’ शब्द पर जोर दिया गया। यह भूलकर कि ‘सीख’ कोई शब्द नहीं बल्कि ओज़, वीरता और स्वाभिमान का प्रयाय है। ‘एम्स’ के पास शाम होते होते हुज़ूम जमा हो आई । आततायियों के लिये तो महज़ एक बोतल शराब ही आग है फिर उसपे ‘खून का बदला खून’ और ‘मां का बदला बेटे लेंगे’ जैसे नारों ने घी का काम किया। शाम सात बजे से दंगाईयों ने एम्स और उसके आस पास के इलाके फूक दिये ।
मिस्टर नागपाल अपने अस्थमा के नियमित चेकअप के लिये तड्के ही एम्स के लिये निकल गये थे। मगर जब पहुंचे तो वहां की हालत देख कर लौट गये । जब लौटे तो दिल्ली के दिल में बवाल मचा था और उनके दिल में सवाल। सवाल यह कि क्या यह दंगा मेरे ‘पालम’ तक भी पहुंचेगा। क्या हम अपने भर मे भी महफूज नहीं हैं? पालम तो मेरा गांव है, मेरे अपने लोग हैं, मेरे भाई हैं। तकसीमी सियासत से महरूम। क्या ये भी वैसा ही करेंगे जैसा वह रास्ते भर सुनते आयें हैं। रास्ते मे हरनाम मिला था पुछ रहा था कि उसक बेटा भी एम्स ही गया है । कहीं दिखा क्या? उसकी आंखो मे एक सूनापन छोड कर मिस्टर नागपाल आगे बढ गये ।
बुझे मन से जब मिस्टर नागपाल अपने घर मे घुसने लगे तो उन्होने ऋषि के कमरे के बाहर चार जोडी चप्प्लें देखीं। यह असामान्य बात इसलिये भी थी कि किराये पर कमरा देते वक्त मिस्टर नागपाल ने पहली शर्त यही रखी थी कि कमरे मे छडेबाजी उन्हे बिल्कुल नहीं पसन्द और दूसरी इसलिये भी की बीते सात महीनों से ऋषि ने किसी को घर पर नही बुलाया था और उनकी शर्त का पूरा ख्याल रखा था। मिस्टर नागपाल को एक बार ख्याल आया कि बाहर तक आने वाली फुस्फुसाहट अचानक बन्द क्यों हो गई । पर कुछ सोचकर वह धीरे धीरे सीढीयों से चढ कर उपर अपने घर मे दाखिल हो गये ।
नीचे ऋषि के कमरे मे बन्द फुस्फुसाहट फिर तेज हो गई।
‘इसको भी मारेंगे’ । ‘तसल्ली से मारेंगे साले को’। ‘पिछले साल जगराता का चन्दा मांगने आये थे तो डांट कर भगा दिया था साले ने’ । पहले ने कहा।
’भाई, लड्कों मे काफी बेईज़्ज़ती हुई थी अपनी’। दूसरे ने कहा।
‘घणा चौधरी बना फिरता है मुहल्ले का’। ‘कल निकालेंगे चौहद्दी इसकी’ । पहले ने फिर कहा ।
’लेकिन करना क्या है’ ? अबकि बार तीसरे ने पूछा।
‘करना कुछ नही है ज्यादा से ज्यादा लडके जमा करो’ । ‘असलहे और रॉड वगैरह जमनापार से आ रहे है’। ‘वोटर लिस्ट मिल गई है’। ‘इनके सारे घरों पर एक निशान लगा देना है जिससे हमारे भाई समझ जायें कि इसी घर पे हमला करना है’ ।‘अस्लहे की कमी नही होगी बस लडके होने चाहिये’ । ‘ओये ऋषि इसीलिये तेरे पास भी आयें हैं’। ‘इन सालों को  खींच खींच के, निकाल निकाल के मारना है’ । ‘तू चल रहा है ना साथ’! पहले ने एक सांस मे कहा ।
’हां हां भाई’।‘बिल्कुल साथ हूं’। ‘जब आप कहें’। ऋषि ने एक सांस मे कहा ।
’शाबाश’ । ‘भाई है अपना तू’ । ‘और वैसे भी चलना तेरी मजबूरी है’। ‘पंजाबियों के घर किरायेदार है’। ‘कही अन्जाने मे तुझे भी मत टांग दें सरिये पर’। तीसरे ने खिखियाते हुए कहा।
’अच्छा अब चलते है । बाकि लडकों को भी इक्ट्ठा करना है। ‘तुझे लेने मै ही आउंगा, तैयार रहियो’। कहकर तीनों लडके कमरे से बाहर निकल गये ।
निकलते वक्त ऋषि ने देखा कि ‘पहले’ ने धीरे से इंट का एक टुकडा उठा कर मकान पर कोई निशान बना दिया। उसकी रूह कांप गई। उसने फौरन अपने कमरे का दरवाजा बन्द किया और बैठ कर सोचने लगा । इस स्थिति मे भी उसका दिमाग तेजी से काम कर रहा था। इसिलिये उसने तपाक से उनका साथ देने की हामी भर दी थी । उसने सोचा था कि वह उपर जा कर मिस्टर नागपाल को सारी बात बता देगा और उनसे इसी वक्त घर छोड कर जाने के लिये कहेगा । जैसे ही मिस्टर नागपाल निकल जायेंगें वह जाकर उन लडकों को बतायेगा कि उसके मालिक मकान तो निकल रहे हैं। जो करना है अभी करो । लेकिन उनकी तैयारी तो रात की है दिन होने की वजह से वो कुछ कर नही पायेंगे और् इस तरह उसपर कोई शक भी नही करेगा ।
यही सब सोचते हुए ऋषि तेज कदमों से सीढियां चढने लगा कि तभी उसे मिस्टर नागपाल नीचे उतरते  दिखाई दिये ।
इस वक्त कहां जा रहे है अंकल ? ऋषि ने अचरज से पूछा ।
गेट मे ताला लगाने । मिस्टर नागपाल ने कहा।
लाईये मैं लगा देता हूं। ऋषि ने ताला लेते हुए कहा ।
’माहौल ठीक नहीं है’।‘तुम भी घर से मत निकलो’ । मिस्टर नागपाल ने ताला खींच कर देखा ।
अंकल मुझे इसी बारे मे आपसे कुछ बात करनी है। ऋषि ने चाभियां थमाते हुए कहा ।
कहो। मिस्तॅर नागपाल को अनिष्ट की आशंका हो गई थी ।
ऋषि जानता था कि मिस्टर नागपाल अस्थमा के मरीज हैं और इतनी गम्भीर बात उनपे क्या असर कर सकती है। फिर भी उसने ऋषि बातें और योजनायें विस्तार मे बता दीं। यह भी उनके घर के बाहर भी निशान लगा दिया गया है ।
‘और तुम भी उनके साथ हो’ ? सब सुनकर मिस्टर नागपाल ने बस एक सवाल पूछा ।
’मुझे अपना घर बचाना है’ । ऋषि ने धीरे से कहा।
’और तुम्हारे अपने लोग’? मिस्टर नागपाल ने पूछा।
’जो मेरे अपने हैं, उन्ही के साथ हूं’ ।‘आप बस इतना करें कि आंटी, मनु और कीमती माल असबाब लेकर अभी के अभी किसी रिश्तेदार के यहां चले जाएं या किसी गुरुद्वारे में’। ‘मामला शांत होने पर फिर वापिस आ जाईयेगा’। ऋषि ने समझाने की कोशिश की ।
’और जब वापिस आयें तो घर पर दूसरे का कब्जा पायें’। ‘अपने ही घर के लिये पुलिस कोर्ट के दरवाजे खटखटायें’। ‘उन्हे एक हफ्ते के भीतर ही अपने जिन्दा होने क सबूत दिखायें या फिर एक बार फिर रिफ्यूजी के सर्टिफिकेट के लिये गिड्गिडायें और फिर कहीं बद्बूदार नाले या सडान्ध के पास रिहैबिलिटेट किये जाएं। नहीं बेटाजी नहीं। इस दफा ये नही होने का। इस दफा यहीं मरेंगे, अपने लोगों के बीच। और चाहे तो तू ही मार दे’ । मिस्टर नागपाल ने फफकते हुए कहा ।
ऋषि के पास समय ज्यादा नहीं था और मिस्तर नागपाल मानने को तैयार नहीं थे। उसे जल्दी ही कुछ और सोचना था।
उसे सोचना था कि सबसे सुरक्षित जगह के बारे मे । उसे सोचना था आने वाली काली सुबह के बारे मे । उसे सोचना था तीन तीन अपनों के बारे मे । और सबसे उपर उसे सोचना था मनु के सपनों के बारे में । नह तेजी से सोच रहा था। अचानक उसने सिढियों पर बैठे मिस्टर नागपाल को उपर चलने को कहा ।
क्या हुआ ? मिस्टर नागपाल ने सेर उठा कर पूछा ।
बस चलिये । ऋषि ने उन्हें हाथ से लगभग खींचते हुए कहा ।
उपर कमरे में मिसेज नागपाल और मनु दरवाजे से सट कर नीचे की बातें सुनने की कोशिश ही कर रही थीं। माहौल की नज़ाकत और मनु की रेडियो की आदत ने इतना तो बता ही दिया था कि सब कुछ ठीक नही है और रही सही आशंका मिस्टर नागपाल ने दिन मे गेट बन्द कर पूरी कर दी थी।
उपर पहुंचते ही ऋषि ने सबसे पहले दरवाजा बन्द किया और सारी हालात फिर से तीनों को बता दीं । यह भी कि खतरा जान ओ माल का भी है और यह स्थिति कमोबेश पूरी दिल्ली की होने वाली है।  हालांकि उसने यह नही बताया कि इस घर कि निशानदेही हो चुकी है। समय भी अपने बायीं ओर तेजी से खिसकता जा रहा है ।
आपलोग मेरे कमरे मे रहेंगे। ऋषि ने लगभग आदेश दिया ।
ह्म अपना घर छोड कर कहीं नही जायेंगे । ये घर, ये मकान यूं ही छोड कर भाग जाने के लिये नहीं बनाया था । मिस्टर नागपाल जिद पर अडे थे ।
आप अपना घर छोड कर कहीं नही जा रहे । बस यहां खतरा ज्यादा है इस्लिये  आप नीचे वाले कमरे मे जा रहे हैं। देखिये...  वो जानते है कि नीचे वाला कमरा मेरा है और उसमे ताला भी इस वजह से लगा है क्युंकि मै बाहर हूं । उनके पास समय नही होगा छानबीन का। एक बार देखेंगे कि उपर कोई नही है तो हो सकता है कि चले जायें। ऋषि ने मिस्टर नागपाल का हाथ अपने हाथ मे लेते हुए कहा ।
इस बार जब मिस्टर नागपाल ने कुछ नही कहा तो ऋषि को विश्वाश हुआ कि वह आगे बात कर सकता है ।
’आंटी आप रोईये नही और मेरी कुछ बातें ध्यान से सुन लिजिये। घर मे जितना भी आलू या कन्द है पका लिजिये । ना जाने ये बलवा कितना लम्बा चले। पीने का पानी मेरी सुराही मे है। यहां से ले जाना खतरनाक् होगा। उससे ही काम चलाना होगा। घर से बस सोने चान्दी जैसे कीमती सामान और कुछ कपडे ही लेकर चलिये। कुछ कपडे बिखरा दिजिये और आलमारी खुली छोड दिजिये। ऋषि ने जब कहना बन्द किया तो उसने देखा कि मिसेज नागपाल की जगह मनु रो रही है।
बेटा जी सब ठीक तो होगा ना । मिसेज नागपाल ने आलू तसले मे डालते हुए कहा।
जी भगवान पर भरोसा रखिये। ऋषि ने मिस्टर नागपाल की दवाईयां सहेजते हुए कहा।
हमने किसी का क्या बिगाडा है । मिसेज नागपाल ने नाक पोछते हुए कहा ।
ऋषि  को लगा कि उसके रहने की वजह से मिसेज नागपाल को अपनी कीमती सामान निकालने मे झिझक हो रही है। उसने फौरन ही कहा ।
आप लोग सामान बांध लें मै जरा नीचे से होकर कर आता हूं । उसने मिस्टर नागपाल से गेट की चाभी लेते हुए कहा।
 नीचे आते ही ऋषि ने सबसे पहले बाहर से जाकर अपनी खिडकी की दारारों  से झांक कर खुद को आश्वस्त किया कि बाहर से कुछ दिखता तो नही है । क्योंकि उसे पता था कि भीतर से बाहर दिखता है । कमरा छोटा होने के कारण तीन लोग खिडकी के तरफ ही बैठ पायेंगे। दरवाजे के पास बैठना तो खतरे से खाली नही है। आस्वस्त होने के उसने सुराही मे पाने भर दिया। वह थोडा सुस्ताना चाह रहा था मगर उसे पता था कि अगले कुछ घंटे उसपर बहुत भारी गुजरने वाले है। इसलिये वह उठा और उपर की ओर चल दिया ।
उपर पहुंचते ही उसने दरवाजे पर खडी मनु को देखा। मनु... मनजीत नागपाल । जिसे कभी उसने इतना शांत नही देखा था। इतना उज़ाड । इतना शीतरक्त।  मनू जिसे कभी कुछ पता नही होता। हर बात पर उसका एक  ही जवाब होता ‘ मैनु की पता’ । आज लगता है जैसे सब जान गई है । निर्वाण की स्थिति है जहां सब कुछ नीरव हो जाता है । उसे ऐसे देख ऋषि थोडा डर गया फिर भी खुद को सम्भाल कर कहा ।
’तैयारी हो गई’।
उजडने के लिये क्या तैयारी करनी है बेटा। बस आपने जो कहा था वो रख लिया है । मिसेज नागपाल ने कहा ।
आईये फिर नीचे चलते हैं उसने असहाय से पडे मिस्टर नागपाल को उठाते हुए कहा ।
क्रमश:)(

1 comments:

vibha rani Shrivastava said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शनिवार 29 अप्रैल 2017 को लिंक की जाएगी ....
http://halchalwith5links.blogspot.in
पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!


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